महाविभूति: सी. वी. रमन | C.V. Raman Biography

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अरसे से देश का एक वक्त एक है। यानी तब जम्मू-कश्मीर या दिल्ली में मौजूद शख्स की घड़ी में रात के नौ बजते हैं, तो तमिलनाडु, असम, अरूणाचल प्रदेश, नागालैंड और अंडमान निकोबार द्वीप समूह में ही घड़ी नौ बजे का ही वक्त दिखा रही होती है। हालांकि भौगोलिक स्थितियों के मुताबिक रात के अंधेरे में इन सभी जगहों पर काफी फर्क दिखता है। यह अंतर सुबह के वक्त तब और ज्यादा दिखता है, जब सूरज उगता है।

अरुणाचल प्रदेश समेत पूरे पूर्वोत्तर भारत और अंडमान निकोबार द्वीप समूह में सूर्योदय शेष भारत के मुकाबले काफी पहले हो जाता है। इन स्थानों पर सरकारी दफ्तर जब बाकी देश को हिसाब से सुबह 9 बजे शुरू होते हैं, तो दोपहर जैसा माहौल दिखने लगता है। इसी तरह शाम 5 बजे दफ्तर बंद होने के वक्त वहां अंधेरा ढलने लगता है, जबकि दिल्ली हो या कायंबटूर, सभी जगह सूरज की पर्याप्त रोशनी उस वक्त रहती है। इससे साफ लगता है कि प्रकृति की जो घड़ी है, वह भौगोलिक स्थितियों के अनुसार एक ही देश में काफी अलग चाल चलती है। अब कोशिश हो रही है कि देश को एक रखते हुए अलग-अलग जगहों की भौगोलिक स्थितियों के हिसाब से घड़ी के वक्त को प्रकृति की घड़ी के हिसाब से सेट किया जाए। इधर इसकी एक पहल सीएसआईआर-राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला के संयुक्त तत्वावधान में कराए गए शोध शोधपत्र के नतीजे के रूप में हुई है। इसमें सुझाव दिया गया है कि देश के पूर्वोत्तर राज्यों - असम, मेघालय, नागालैंड, अरूणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, मणिपुर, मिजोरम के अलावा अंडमान व निकोबार द्वीप समूह में घड़ी की सुईयों को बाकी देश के मुकाबले एक घंटा आगे खिसका दिया जाए। यानी अगर दिल्ली में घड़ी सुबह के 9 बजे का वक्त दिखा रही हो तो उसी समय पूर्वोत्तर राज्यों की घड़ी में 10 बज रहें हों। एक प्रकार से यह व्यवस्था देश में दो टाइम जोन बनाने के संबंध में होगी, जिसकी काफी लंबे समय से मांग की जाती रही है।

उल्लेखनीय है कि हमारे देश भारत का मानक समय समन्वित सार्वभौमिक टाइम के मुकाबले 5.30 घंटे आगे चलता है। यूसीटी को ब्रिटेन के ग्रीनविच से होकर गुजरने वाली एक काल्पनिक अक्षांश रेखा के अनुसार सेट किया गया है। अभी इस नियम का पालन करते हुए पूर्वोत्तर राज्यों में बाकी देश की तरह ही सभी घड़ियों को यूसीटी से 5.30 घंटे ही आगे रखा गया है, पर अब मांग की जा रही है कि वहां इसे 6.30 घंटे आगे किया जाए। यानी देश के बाकी हिस्सों के मुकाबले पूर्वोत्तर और अंडमान में घड़ियां एक घंटा आगे चलें। यह मांग बीते अरसे में कई बार की गई है। जैसे, वर्ष 2017 में ही अरुणाचल के तत्कालीन मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने अपने राज्य में पूरे देश से अलग टाइम जोन बनाने की मांग की थी।

जरूरत क्या है?

असम और बाकी पूर्वोत्तर राज्यों के नजरिये से देखें तो दो टाइम जोन एक अनिवार्य जरूरत लगती है। पूर्वोत्तर में सूरज जल्दी उगता है, करीब 4.30 बजे ही सुबह हो जाती है, जबकि सरकारी दफ्तर बंद होते-होते अंधेरा घिर जाता है जिससे घर लौटने वालों को दिक्कत होती है। इन्हीं समस्याओं के मद्देनजर अरसे से पूर्वोत्तर के राज्य अपने लिए अलग टाइम जोन की बात उठाते रहे हैं। इसके अलावा ऊर्जा की बचत के मकसद से भी सरकार देश को दो टाइम जोन में बांटने की संभावनाओं को तलाश रही है। इस बारे में वर्ष 2017 में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रो. आशुतोष शर्मा ने जानकारी दी थी कि एनर्जी सेविंग के उद्देश्य से उनका विभाग देश को दो टाइम जोन में बांटने के संभावित फायदों का अध्ययन कर रहा हैं। बीते कुछ वर्षों में असम कांग्रेस और यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम भी इसकी जरूरत रेखांकित कर चुका है।

कैसे बना आईएसटी

दुनिया में प्रत्येक देश का एक मानक समय है और वह ग्रीनविच के संदर्भ में देखा जाता है। इसी तरह हर देश अपने यहां के एक तय आधार स्थान पर सूर्योदय के अनुसार मानक समय का निर्धारण भी करता है। यह निर्धारण दिल्ली स्थित सीएसआईआर - राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला करती है। दुनिया के ज्यादातर देश एकल टाइम जोन से काम चलाते हैं। इसका आशय यह है कि वहां पूरे देश में स्थान परिवर्तन के साथ घड़ियों की सुइयों में बदलाव नहीं लाना पड़ता। यही स्थिति विशाल भौगोलिक क्षेत्रफल वाले देश भारत में भी है। कश्मीर से कन्याकुमारी और अरुणाचल प्रदेश से गुजरात तक सभी जगह सीएसआईआर - राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला द्वारा तय समय ही चलता है। यह व्यवस्था एक जनवरी, 1906 से बनी हुई है। इसके पीछे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि 1884 में वाशिंगटन में हुई इंटरनेशनल मैरिडियन कॉन्फ्रेंस में जब दुनिया भर के टाइम जोन दूसरे मान्य टाइम जोन के रूप में प्रचलित रहा। हालांकि मुंबई का समय भी 1955 तक अलग से मापा जाता था, लेकिन उसे आधिकारिक तौर पर कभी लागू नहीं किया गया। इसके अलावा पोर्ट ब्लेयर मीन टाइम भी तय किया जाता था।

लेकिन मुशिक क्या है

एक से ज्यादा टाइम जोन बनाना आसान नहीं है, क्योंकि ऐसा करते वक्त देखना होगा कि जब ट्रेनें और विमान एक टाइम जोन से दूसरे टाइम जोन में प्रवेश करेंगे तो इससे कोई समस्या तो नहीं आएगी। इन्हीं दिक्कतों के मद्देनजर अदालतें एक से ज्यादा टाइम जोन के पक्ष में नहीं रही हैं। समय-समय पर उन्होंने ऐसे प्रस्तावों और दलीलों को खारिज किया है।