गुरु महात्म्य (मूल पुस्तक) संपादक- स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज

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    "प्रणवदा शश्वनमस्कुर्वन्तमादरात् । दृष्ट्वा विस्मयमापना पार्वती परिपृच्छति ॥" प्राचीनकाल में सिद्धों और गंधवों के आवासरूप काल कलास पर्वत के शिखर पर कल्पवृक्ष के फूलों से बने हुए अत्यन्त सुन्दर घने मुनियों के बीच व्याघ्रचर्म पर बैठे हुए , शुक आदि मुनियों द्वारा किये जानेवाले और परम तत्व का बोध देते हुए भगवान शंकर को बार - बार नमस्कार करते देखकर , अतिशय नम्र मुखवाली पार्वती आश्चर्यचकित होकर जो पूछा और शिव जी ने जो कहा उसी का वर्णन किया गया है।
    पृष्ठ ४६, सहयोग राशि 20/-डाकखर्च अलग।