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बन्दौं गुरु पद कंज, इसमें गुरु की परम्परा , गुरु की आवश्यकता , सद्गुरु की मर्यादा , गुरु - दीक्षा का महत्त्व प्रभृति विषयों पर उत्तम ढंग से प्रकाश डाला गया है।

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    Description

    यह सर्वविदित है कि संसार में गुरु की महिमा अगम और अपार है । गो० तुलसीदासजी महाराज रामचरितमानस के आरंभ में ही गुरु - वन्दना करते हुए उनकी महिमा गाते हैं वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम् । . यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते ॥ अर्थ - ज्ञानमय , नित्य , शंकररूपी गुरु की वंदना करता हूँ, जिनके आश्रित होने से ही टेढ़ा चन्द्रमा भी सर्वत्र वन्दित होता है । संत कबीर साहब भी गुरु की महिमा को अनन्त बतलाते हैं सतगुरु की महिमा अनन्त , अनन्त किया उपकार । लोचन अनन्त उघारिया , अनन्त दिखावनहार। स्पष्ट है कि संत - सद्गुरु अनन्तस्वरूपी परम प्रभु परमात्मा का दर्शन कराने में पूर्ण समर्थ होते हैं, वे ऐसी दृष्टि प्रदान करते हैं , जिससे प्रभु को प्रत्यक्ष प्राप्त कर सकते हैं । इसीलिए गुरु की महिमा को भी अनंत कहकर विदित किया गया है । वास्तव में गुरु के गुणों को कोई पूर्णत : वाणी द्वारा वर्णन है कर सके , संभव नहीं है । सभी कोई संक्षेप में ही गुरु के गुणगान कर उनके प्रति आभार प्रकट करते हैं । इसीलिए हमारे गुरुदेव कहते हैं गुरु गुण अमित अमित को जाना । संक्षेपहिं सब करत बखाना ॥ ऐसी स्थिति में मुझ जैसे अल्पज्ञ से गुरु की महिमा का बखान करना कहाँ तक संभव हो सकता है । फिर भी परमोदार गुरुदेव से उपकृत होने के कारण दो शब्द उनके यशगान को वंदना के रूप में ' बन्दौं गुरु पद कंज ' नाम की पुस्तिका प्रस्तुत कर रहा हूँ । गुरुचरणाश्रित अच्युतानन्द ।