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सेवा से मेवा (मूल पुस्तक) -गुरुसेवी स्वामी भगीरथ दास जी महाराज

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    Description

    "अभिवादनशीलस्स निच्च वृद्धापचायिनो । चत्तारोधम्मा वड्ढन्ति आयु वण्णो सुखं बलं ।। - धम्मपद , सहस्सवग्गो । जो अभिवादनशील है और जो सदा वृद्धजनों की सेवा करनेवाला है , उस मनुष्य की चार वस्तुएँ बढ़ती हैं - आयु , वर्ण , सुख और बल। गुरुजनों की सेवा करने का फल सेवा करनेवालों के वर्तमान जीवन में या इसके बाद वाले जीवन में अवश्य मिलता है । महापुरुषों का कहना है कि सेवा का फल कभी भी निष्फल नहीं होता है । बल्कि कई गुणा अधिक बनकर सामने आता है । महापुरुषों की सेवा का संस्कार करनेवालों को उत्थान की ओर ले जाता है अर्थात् उनका यह लोक और परलोक दोनों सुखकर होता है ।"। -'भगीरथ' प्रस्तुत पुस्तक में गुरु सेवा के संबंध में बताया गया है।
    पृष्ठ 188+१२, मूल्य 40/-डाक खर्च अलग से. कई सुंदर चित्रों से युक्त.