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स्वागत और विदाई-गान, कबीर साहब, धनी धर्मदास आदि संत-महात्माओं एवं विद्वानों के 71 स्वागत और विदाई गीतों का संकलन

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    Description

    हमारी संस्कृति में अतिथि सत्कार को बहत महत्त्व दिया गया है । हमारा धर्मशास्त्र कहता है कि अतिथि को देवतुल्य मानकर उनका सत्कार करना चाहिए - ' अतिथिदेवो भव । ' यह भी कहा गया है कि अतिथि जिस गृहस्थ के घर से अपमानित होकर लौटते हैं , उसे अतिथि क्रोधावेश में आकर सर्वनाश का अभिशाप दे देते हैं , साथ - ही - साथ अपने पापों को गृहस्थ के घर छोड़कर और उसके पुण्यों को लेकर चल देते हैं । इसके विपरीत , जिस गृहस्थ के घर अतिथि सम्मान पाते हैं , उसे वे फूलने - फलने का हार्दिक आशीर्वाद देकर लौटते हैं । इसीलिए बुद्धिमान् लोग अतिथि का सच्चे हृदय से आदर - सत्कार करते हैं और ख्याल रखते हैं कि उनके किसी व्यवहार से अतिथि देवता को किसी प्रकार का कष्ट नहीं पहुंचे । ' अतिथि - सत्कार हम शरीर , कर्म और मधर वचन से भी करते हैं । आ रही परिपाटी के अनुसार , सभा - सोसायटी में जो मुख्य अतिथि होते हैं , उनके सम्मान के लिए स्वागत - गान गाया जाता है और अभिनंदन - पत्र पढ़कर सुनाया जाता है । यह मधुर वाणी के द्वारा उनका स्वागत करना हुआ । स्वागत - गान और अभिनंदन - पत्र में हम उनके कार्यों एवं सद्गुणों की चर्चा तथा प्रशंसा करते हैं ; अपनी दीनता प्रकट करते हुए उनके शुभागमन की अपनी प्रसन्नता और कृतज्ञता भी जाहिर करते हैं । विदाई के अवसर पर हम विदाई - गान गाते हैं , जिसमें हम कारुणिक शब्दों में अपनी विरह - वेदना व्यक्त करते हैं । हमारी संतमत - संस्था का भी सालो भर जहाँ - तहाँ सत्संग होता रहता है , जिसमें उपर्युक्त परिपाटी का निर्वहण होता है । इसीलिए सत्संग का आयोजन करानेवाले को स्वागत - गान और विदाई - गान की आवश्यकता पड़ती है ।